विचार जन्म लेते हैं
सहजता से , अकारण, अनिच्छित
विचार अपने ही बारे में विचार कैसे कर सकता है
कोई स्वयं को ही कैसे जन्म दे सकता है
स्वयं को जन्म देने वाला तो शाश्वत हुआ
विचारों के उत्पत्ति से ही जन्म होता है , मेरा
मै, जो बना हूँ हज़ारों लाखों विचारों से , जो मेरे नहीं
अबाध बह रहे हैं पीढ़ी दर पीढ़ी , मनुष्य से मनुष्य में
इस प्रवाह का रूकना ही मृत्यु है
जो स्वयं को जानता है , वो भला क्यों पूछेगा
मै कौन हूँ, क्यों हूँ, क्या हूँ , कहाँ हूँ
जो नहीं जानता, वो भी क्यों पूछेगा ऐसे प्रश्न
जानने की इच्छा ही बना देती है
अज्ञात को ज्ञात का हिस्सा
जीवन दर्शन को खगाँलने के पश्चात
मन और हो जाता है , अशांत, दिग्भ्रमित
जंगल में किसी छोटे बच्चे की तरह
जिसका रोना, न रोना बस उसी का
अस्तित्व न होता तो क्या होता
इस प्रश्न का अस्तित्व भी अस्तित्व से है
अनस्तित्व हिस्सा है अस्तित्व का
भ्रामक है पर सत्य है , अस्तित्व
अगर जीवन का उद्देश्य, जानना है जीवन के उद्देश्य को
तो क्यों स्वयं जीवन नहीं जानता अपने उद्देश्य को
क्यों ढूंढ रहा है जीवन अपने ही उद्देश्य को
ये प्रश्न ही बना देते हैं अस्तित्व को जटिल
और जीवन को अर्थहीन
क्या इन प्रश्नो का अस्तित्व ही देता है
जीवन को गति, दिशा और निरंतरता
प्रश्नो का उत्तर मिल जाना ही
पूर्णविराम है , मेरे विचारों का,
और मेरा ।