Sunday, 15 November 2020

लकीर के फ़कीर

 जब मै रेलवे स्टेशन पहुँचा तो वहां बहुत भीड़ थी।   एक तो मै पहले ही लेट, ऊपर से ये भीड़ ।  

इतने सालों बाद उससे मिलने का मौका मै गवाना नहीं चाहता था। 
हालाकिं ट्रेन इस स्टेशन पर बस 2 मिनट रूकती है, बिना प्लेटफॉर्म टिकट के अंदर जाना ठीक नहीं था , सो मै पुरुष वाली लाइन में लग गया। 

तभी मोबाइल की बेल बज उठी , "ट्रेन बस पहुँचने वाली है  है , कहाँ हो तुम ", उधर से आवाज़ आयी । 
मै बस आया , कह कर कॉल मैंने काट दिया। 

महिलाओं की विंडो खाली देख कर मै पुरुष की लाइन छोड़ उस काउंटर पर पहुंच गया। 
"भाई साहेब एक प्लेटफॉर्म टिकट देना "    

मुँह में भरे पान को एक कप में थूकते हुए उसने कहा "दिखाई नहीं देता ये काउंटर महिलाओं के लिए है "
"पर अभी तो कोई लेडीज नहीं है यहाँ ", मैंने विनम्रता परन्तु जल्दीबाजी में कहा। 

"आप को बात समझ नहीं आती क्या, नियम नियम होता है, चलिए आप यहाँ से", उसने लापरवाही से कहा। 
मै फिर से केचुए सी धीमी रफ़्तार से बढ़ने वाली पुरुषों की लाइन में लग गया । 

लगभग 10 मिनट बाद मेरे फ़ोन की घंटी फिर से बज उठी। 

मैं बिना टिकट के स्टेशन की तरफ भागा, गाड़ी स्टेशन से छूट रही थी, प्लेटफॉर्म चार पे पहुँचना मुश्किल था और अब उससे मिल पाना भी।